कूटनीतिक मोर्चे पर लगातार मजबूत होते पुतिन.....बुडापेस्ट में बैठक उनकी निजी जीत
वॉशिंगटन। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों कूटनीतिक मोर्चे पर लगातार मजबूत होते दिख रहे हैं। पहले अमेरिकी न्यौते पर अलास्का पहुंचे और अपनी शर्तों पर वार्ता करके लौटे। इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि यूक्रेन क्रीमिया सहित कुछ हिस्सा रूस को देने पर सहमत हो जाए और उसके साथ ही स्थायी तौर पर जंग खत्म करने पर सहमति बने। लेकिन ऐसा होता है, तब यह पुतिन के लिए निजी जीत होगी और वह अखंड रूस के सपने की ओर एक कदम बढ़ाते दिखाई देने वाले है। अब खबर आ रही हैं कि अमेरिका अगली त्रिपक्षीय मीटिंग हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में करना चाहता है। यदि खबर सच साबित होती हैं तब पुतिन की ही जीत मानी जाएगी।
ऐसा इसलिए कि यूक्रेन और रूस की जंग में हंगरी लगातार रूस का समर्थन कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि हंगरी उस नाटो का सदस्य है, जिसकी अगुवाई अमेरिका करता है। इस संगठन को परंपरागत तौर पर रूस विरोधी माना जाता है, लेकिन जंग में हंगरी ने लगातार यूक्रेन पर ही निशाना साधकर युद्ध विराम की सलाह दी है। अब यदि उसी देश में त्रिपक्षीय मीटिंग होती है, तब यह पुतिन के लिए निजी जीत होगी। उनके हंगरी के पीएम विक्टर ऑर्बन से बहुत अच्छे रिश्ते हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हंगरी के अमेरिका के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं और रूस से भी वह बनाकर चल रहा है।
ट्रंप मानते हैं कि हंगरी ही त्रिपक्षीय वार्ता के लिए अनुकूल देश है। हालांकि यूक्रेन के लिए यह चिंता की बात है क्योंकि उसके रिश्ते हंगरी से बहुत अच्छे नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार पुतिन और फ्रेंच राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भी जल्दी ही एक बैठक होने वाली है। बता दें कि इस बीच स्विट्जरलैंड ने भी मध्यस्थता के लिए होस्ट बनने की इच्छा जाहिर की है। बुडापेस्ट में मीटिंग यूक्रेन के लिए 30 साल पुरानी यादें भी ताजा करेगी, जब ब्रिटेन, अमेरिका और रूस ने संप्रभुता प्रदान करने पर सहमति जाहिर की थी। इसके अलावा उससे परमाणु हथियारों को भी त्यागने को राजी कर लिया था।
बता दें कि पिछले दिनों हंगरी ने यूक्रेन की तब आलोचना की थी, जब रूस की तेल पाइपलाइन पर अटैक हुवआ था। हंगरी का कहना था कि ऐसा करना गलत है। इस पर यूक्रेन ने कहा था कि जंग की शुरुआत हमने नहीं की है। यदि कोई दिक्कत है तो हंगरी को शिकायत रूस से करनी चाहिए। यह दिलचस्प तथ्य है कि नाटो का मेंबर होते हुए भी हंगरी लगातार रूस का ही समर्थन करता रहा है और उससे तेल की भी बड़े पैमाने पर खरीद की है।
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