अमेरिका से दूरी बना रहे कई देश, दक्षिण कोरिया भी करेगा बाय-बाय
वाशिंगटन । कभी दुनिया भर में सहयोगियों को साथ लेकर चलने वाला वॉशिंगटन अब एक-एक कर अपने दोस्तों से हाथ धोता दिख रहा है। भारत से लेकर यूरोप और एशिया तक, अब वो देश भी अमेरिका से दूरी बनाने लगे हैं जो कभी उसके पक्के साझेदार माने जाते थे। इसी कड़ी में अब दक्षिण कोरिया ने भी संकेत दे दिए हैं कि उसका झुकाव धीरे-धीरे चीन की ओर बढ़ रहा है।
भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे अमेरिका को यह झटका और भी बड़ा लग सकता है। क्योंकि वॉशिंगटन चाहता है कि भारत चीन से दूरी बनाए, रूस से नजदीकी घटाए और पूरी तरह अमेरिकी पाले में आ जाए। लेकिन भारत साफ कर चुका है… उसके लिए पहला और आखिरी पैमाना राष्ट्रीय हित है। और अब जब दक्षिण कोरिया जैसा अहम एशियाई देश भी बीजिंग की तरफ बढ़ रहा है, तो अमेरिकी रणनीति की जड़ें हिलनी तय हैं।
अमेरिका चाहता है कि साउथ कोरिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया उसके साथ मिलकर चीन को घेरें। लेकिन अगर सियोल बीजिंग के साथ रिश्ते सुधारता है, तो यह “कोरिया को अपने पाले में रखने” की अमेरिकी रणनीति को कमजोर कर देगा। चीन-रूस नज़दीकी पर संतुलन: यूक्रेन युद्ध और ताइवान विवाद पहले से ही अमेरिका के सिरदर्द बने हुए हैं। ऐसे वक्त साउथ कोरिया का चीन की तरफ झुकाव वॉशिंगटन के लिए और असहज स्थिति पैदा करेगा। अमेरिका दुनिया की चिप्स और टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन को चीन से हटाकर फ्रेंड-शोरिंग करना चाहता है। लेकिन अगर साउथ कोरिया बैलेंस बनाने लगे, तो यह अमेरिकी प्रयासों को कमजोर कर देगा। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यंग ने चीन के लिए एक विशेष दूतमंडल भेजा। यह दौरा संयोग से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों की 33वीं सालगिरह पर हुआ। चार दिन की इस यात्रा का नेतृत्व पूर्व नेशनल असेंबली स्पीकर पार्क ब्युंग-सुग कर रहे हैं, जो राष्ट्रपति का व्यक्तिगत पत्र लेकर बीजिंग पहुंचे। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रतिनिधिमंडल में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद किम ताए-न्योन और पार्क जंग के अलावा पूर्व राष्ट्रपति रो ताए-वू के बेटे रो जे-हुन भी शामिल हैं। साफ है कि यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि चीन और दक्षिण कोरिया के बीच नए समीकरण गढ़ने की शुरुआत है।
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