मनीला में आयोजित सम्मेलन में उठी चेतावनी, अवैध तंबाकू कारोबार पर लगानी होगी सख्ती
व्यापार: वाणिज्यिक नेतृत्व से अवैध व्यापार पर ध्यान देने के लिए एक महत्वपूर्ण मानसिक बदलाव की जरूरत है। व्यवसाय में, संचालन किसी देश के नियमों से निर्देशित होता है, जिनका हमें पूरी तरह पालन करना होता है। साथ ही, फिलिप मॉरिस इंटरनेशनल (पीएमआई) की अपनी नीतियां और प्रक्रियाएं भी हैं। इसके उलट, अवैध नेटवर्क बिना किसी व्यवस्था के काम करते हैं। मैं इसे जटिल संगठित अपराध और पैसे की हेराफेरी की योजना कहता हूं, जिसके आतंकी फंडिंग से भी संबंध हैं। नकली सिगरेट का अवैध कारोबार तेजी से फलफूल रहा है। वैध की तुलना में सस्ता होने की वजह से अवैध उत्पादों के प्रति आकर्षण बढ़ा है। यह न सिर्फ उपभोक्ता मांग के लिए चुनौती है, बल्कि नियामकी अनुपालन को बनाए रखने की जरूरत पर बल देती है।
कौनसी नियामकीय खामियां बड़ी चुनौती पेश करती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग से इनका समाधान कैसे संभव है?
तंबाकू उत्पादों के निर्यात के मोर्चे पर नियामकीय खामियां दिखती हैं। आसियान, भारत, चीन और जीसीसी में निर्माताओं, निर्यातकों व ट्रांसशिपर्स के लिए सिर्फ घरेलू नियमों का पालन करना आवश्यक है। उन पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नहीं है कि उत्पाद उपभोग के लिहाज से बाजार में वैध है या नहीं। ऐसे में अवैध उत्पाद बन रहे हैं और उनका निर्यात हो रहा है। कोई भी देश अकेले इसका समाधान नहीं कर सकता। डब्लूसीओ या डब्लूटीओ के नेतृत्व में एक ढांचा बनाने की जरूरत है।
अवैध कारोबार नेटवर्क को कैसे खत्म किया जा सकता है?
अवैध व्यापार को रोकने में तकनीकी की मदद ले सकते हैं, लेकिन कई समाधान जागरूकता और अंतर-सरकारी सहयोग पर अधिक निर्भर करते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर वियतनाम ने तंबाकू उत्पाद निर्यात किए, जिसे भारत में अवैध रूप से दिखाया गया, तो सीमा शुल्क डाटा से इसकी पहचान की जा सकती है। इस जानकारी के आधार पर भारत और वियतनाम मिलकर समस्या के स्रोत से आसानी से निपट सकते हैं।
अवैध व्यापार को लेकर भारत में कौन से क्षेत्र प्राथमिकता वाले हैं?
भारत में सरकारी एजेंसियों ने सहयोग की मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई है। राष्ट्रीय तंबाकू उत्पाद ट्रैकिंग और ट्रेसिंग सिस्टम का विकास इसका उदाहरण है। भारत सरकार ने इस पहल में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है। सीमावर्ती क्षेत्र सबसे संवेदनशील हैं, क्योंकि इनमें लॉजिस्टिक निकटता और सामाजिक-आर्थिक कारकों का प्रभाव होता है। इन क्षेत्रों में अक्सर कम आय जैसी चुनौतियां होती हैं, जिससे सस्ते और गैर-टैक्स उत्पादों की मांग बढ़ती है।
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