मौखिक मृत्यु-पूर्व घोषणा कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं, हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा से किया बरी
जबलपुर: जबलपुर हाईकोर्ट ने कहा है कि तथाकथित मृत्यु-पूर्व मौखिक घोषणा कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है. मृत्युकालिक कथन का कोई पुष्टिकारक साक्ष्य नहीं है, तो कानून की दृष्टि में दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता. प्रत्यक्षदर्शी विवरण व परिस्थितिजनक साक्ष्यों की कड़ी पूरी नहीं होने के कारण हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा से दंडित पति-पत्नी तथा देवर को दोषमुक्त कर दिया.
आरोपियों ने निचली अदालत के आजीवन कारावास की सजा को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
अपीलकर्ता पिंकी यादव, उनके पति रमाकांत यादव और देवर मिंटू उर्फ़ घनश्याम ने हत्या के मामले में अनूपपुर न्यायालय द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. अपील में कहा गया था कि देवेन्द्र जायसवाल ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में बताया था कि लूट के उद्देश्य से उस पर पांच व्यक्तियों ने हमला किया था. घटना 30 मई 2019 की रात को हुई थी और घायल देवेन्द्र को उपचार के लिए जबलपुर में भर्ती करवाया गया था.
पुलिस द्वारा घटना के पांच दिन बाद 4 जून को अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. उपचार के दौरान 14 जून को देवेन्द्र की मौत हो गई. जिसके बाद उनके भांजे ने पुलिस को बताया कि देवेन्द्र ने उसे बताया था कि अपीलकर्ताओं सहित दो अन्य व्यक्तियों ने उस पर हमला किया था. जिसके आधार पर जिला न्यायालय ने उन्हें सजा से दंडित किया.
कोर्ट ने कहा- आरोपियों के नाम एफआईआर या सीआरपीसी की धारा 161 के तहत प्रारंभिक बयानों में उल्लेखित नहीं थे
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य श्रृंखला पूरी नहीं है. अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास और चूक है. आरोपियों के नाम एफआईआर या सीआरपीसी की धारा 161 के तहत प्रारंभिक बयानों में उल्लेखित नहीं थे. तथाकथित मौखिक मृत्यु-पूर्व घोषणा भी कानून की नज़र में स्वीकार्य नहीं है. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए दोषसिद्धि का विवादित निर्णय कानून की नज़र में कायम नहीं रह सकता है. युगलपीठ ने जिला न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ताओं को दोषमुक्त कर दिया. अपीलकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता ब्रह्मेन्द्र प्रसाद पाठक ने की.
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