सुप्रीम कोर्ट के अरावली निर्णय का जाजू ने किया स्वागत कहा—पहाड़ 9 मीटर हो या 99 मीटर, कटाई क्यों
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वतमाला को लेकर 20 नवंबर 2025 के अपने पूर्व निर्णय को स्थगित किए जाने का पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू ने स्वागत किया है। जाजू ने इसे अरावली संरक्षण की दिशा में एक जरूरी और सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि अदालत ने यह स्वीकार कर लिया है कि अरावली की नई परिभाषा में अस्पष्टताएं हैं और इसके कारण एक खंडित व अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता था।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पुराने निर्णय और समिति की रिपोर्ट पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार तथा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात को नोटिस जारी किया है। साथ ही एक नई उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जो अरावली की परिभाषा, सीमाओं और पारिस्थितिक प्रभाव की वैज्ञानिक समीक्षा करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई खनन लीज या पुरानी लीज के नवीनीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना कोई कार्रवाई नहीं होगी।
पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू ने कहा कि देशभर में अरावली की कटाई और अवैध खनन को लेकर जन आक्रोश के दबाव में केंद्र सरकार ने खनन पर रोक की केवल औपचारिक घोषणा की थी। जमीनी हकीकत यह है कि न तो अवैध खनन रुका और न ही अरावली की पहाड़ियां सुरक्षित हुईं।
जाजू ने सवाल उठाया कि अरावली की पहाड़ी 9 मीटर की हो या 99 मीटर की, उसे काटने की अनुमति आखिर क्यों दी जाए। यह प्रकृति विनाश को खुली छूट देने जैसा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अरावली के निरंतर विनाश से भूजल स्तर गिर रहा है, जैव विविधता नष्ट हो रही है और जलवायु संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे भविष्य में भूकंप जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
उन्होंने केंद्र सरकार के इस दावे को भ्रामक बताया कि नई परिभाषा से केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र प्रभावित होगा। जाजू के अनुसार 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली का 0.19 प्रतिशत भी लगभग 274 वर्ग किलोमीटर, यानी 27 हजार हेक्टेयर से अधिक होता है। उन्होंने मांग की कि अरावली की पुरानी परिभाषा यथावत रखी जाए और खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
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