रंग नहीं, डोलची की बौछारें; पावटा में धुलंडी के अगले दिन अनोखी होली
दौसा| जिले के महवा उपखंड के पावटा गांव में होली की दूज पर सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरे उत्साह और जोश के साथ निभाई जाती है। यहां खेली जाने वाली डोलची होली को देखने के लिए प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर से लोग पहुंचते हैं। गांव के हदीरा मैदान में गुर्जर समाज के दो गांवों के युवा दो दल बनाकर आमने-सामने उतरते हैं। दोनों पक्ष पानी और रंग से भरी बाल्टियां तथा चमड़े की बनी डोलची लेकर एक-दूसरे पर बौछारें करते हैं। यह दृश्य किसी युद्ध अभ्यास जैसा प्रतीत होता है।
शहीद बल्लू सिंह की याद में परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, हजारों वर्ष पहले दो समुदायों के बीच हुए संघर्ष में पावटा गांव के वीर बल्लू सिंह शहीद हो गए थे। मान्यता है कि सिर कट जाने के बाद भी उन्होंने दुश्मन सेना से लड़ाई जारी रखी और अंत तक संघर्ष करते रहे। उनकी वीरता की स्मृति में हर वर्ष डोलची होली का आयोजन किया जाता है। युवाओं के बीच शहीद बल्लू सिंह के जयकारे गूंजते हैं और पूरा मैदान वीर रस से भर उठता है।
एक महीने पहले शुरू होती हैं तैयारियां
डोलची होली की तैयारी लगभग एक माह पहले शुरू हो जाती है। युवा अपनी पीठ पर हल्दी और तेल की मालिश करवाना शुरू कर देते हैं, ताकि प्रहार सहने में आसानी हो। चमड़े की डोलची को भी करीब 15 दिन पहले तेल पिलाया जाता है, जिससे वह नरम और लचीली बनी रहे।
ऐसे खेली जाती है डोलची होली
पावटा गांव में दो दल एक पीलवाड़ पट्टी और दूसरा जिंद पार्टी मैदान में उतरते हैं। दोनों पक्षों के युवा एक-दूसरे की पीठ पर डोलची से पानी और रंग की बौछारें करते हैं। हदीरा मैदान में दडगस और पीलवाड़ गोत्र के युवा आमने-सामने होकर इस परंपरा को निभाते हैं। तीव्रता और जोश के कारण इसे ‘खूनी होली’ के नाम से भी जाना जाता है। डोलची होली के बाद देवर-भाभी की होली खेली जाती है, जिसमें भाभी देवरों पर डोलची से प्रहार करती हैं। इसके पश्चात ढोला-मारू की सवारी निकाली जाती है, जो उत्सव का विशेष आकर्षण होती है।
एक बार परंपरा रुकी तो पड़ा था अकाल
ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार, एक बार किसी कारणवश डोलची होली का आयोजन नहीं हो सका था। इसके बाद गांव में प्राकृतिक आपदाएं आईं और अकाल की स्थिति बन गई। तब ग्रामीणों ने शहीद स्थल पर जाकर मन्नत मांगी और हर वर्ष धुलंडी के अगले दिन डोलची होली खेलने का संकल्प लिया। मान्यता है कि इसके बाद गांव को आपदाओं से राहत मिली और तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
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