नही रहे  ही मैन, हंसमुख, यारो का यार धर्मेन्द्र जैसा नहीं देखा कोई किरदार

विमल चैहान | हिन्दी सिनेमा में अपने अभिनय की छाप करोड़ो दर्षकों के दिलो पर छोड़ने वाले धर्मेन्द्र ने फिल्म जगत में सबसे लम्बी पारी खेली तो कोई अतिषोक्ती नहीं होगी। पंजाब के गुरूदासपुर के एक छोटे से किसान परिवार में जन्में धर्मेन्द्र दोआल का फिल्मी सफर इतना भी आसान नहीं था। लम्बे संघर्श के बाद अनेक असफलताओं के बाद आखिर उनहें कामयाबी मिल गई फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा अनेक यादगार फिल्मों में अभियन के साथ उन्होंने लगभग 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वही बतौर निर्माता उन्होंने तीन फिल्मों का निर्माण भी किया। अनेक अवार्डो से नवाजे गऐ धर्मेन्द्र अभिनेता से नेता भी बने और भाजपा के टिकट पर उन्होंने बीकानेर से सांसद के रूप में चुनाव लड़ा तथा विजयी भी रहे।

ही मैन के रूप में मषहुर रहे धर्मेन्द्र का षारीरिक गठन उनकी चाल, मिलसार व्यवहार, यारो का यार कहे जाने वाले इस अभिनेता के व्यक्तित्व में अनेक खूबिया थी। उनका आकर्शक व्यक्तित्व किसी भी व्यक्ति को चुम्बक की तरह खींचने में सक्षम था। मेरी बतौर पत्रकार पहली मुलाकात पुश्कर में हुई जब वे ‘‘बटवारा’’ फिल्म की षूटिंग के लिऐ आये थे। बाद में मुम्बई में फिल्म सिटी में फिल्म ‘‘हुकूमत’’ सहित अन्य फिल्मों की षुटिंग पर आप से मुलाकात भी होती और बातचीत भी। वे राजस्थान की प्राकृतिक सौन्दर्यता व यहाँ के निवासियों से भी खासा प्रभावित थे। उन्होंने एक बार बताया कि राजस्थान का वे अहसानमन्द है व रहेगें। जीवन के फिल्मी संघर्श के दौर में प्रदेष में बनी फिल्म ‘‘मेरा गाँव मेरा देष’’ उस दौर में सुपरहिट रही थी जिसने उन्हें आॅक्सीजन प्रदान की। खाने-पीने के बेहद षौकिन धर्मेन्द्र जी से एक बार जब मैंने पूछा कि आपके सुदृढ़ गठीले षरीर का राज तो उन्होंने बताया कि नियमित व्यायाम।

मेरी धर्मेन्द्र जी से घनिश्ठता उस दोर में हुई जब उन्होंने बीकानेर से सांसद का चुनाव लड़ा मैं उन दिनों हनुमानगढ़ में एक दैनिक समाचार पत्र का ब्यूरों प्रमुख था चूकिं वे पूर्व परिचित थे सो मुलाकात हुई वे चुनाव में बहुत घबराऐं हुए थे। उन्हें यह डर था कि कही चुनाव में हार गऐ तो इज्जत के काकरे ना हो जाऐ तब उन्होंने किसी ज्योतिश से मिलवाने की बात कही। मैनें ब्यावर से विख्यात ज्योतिशी षम्भू गुरू से उन्हें मिलवाया उन्होने बताया कि आप निष्चिंत रहो चुनाव आप ही जीतोगें। इसके बाद वे आष्वस्त नजर आऐ और चुनाव जीते भी। उन्हें फोटोग्राफी, षेरो-षायरी का भी काफी षौक था उन्होंने अनेक षायरियाँ सुनाई भी। धर्मेन्द्र जी अपने दोनों पुत्रों व पुत्रियों को बहुत प्यार करते थे। वे अपने षुभचिंतकों, फैनस, मित्रों के साथ भी घुल मिल जाते थे तथा नवोदित कलाकारों, जुनियर आटिस्टो के साथ भी परिवार के सदस्य जैसा व्यवहार करते थे। मैं ऐसे अभिनेता को कभी भूला नहीं पाऊंगा। उनके साथ बिताया हर पल सुखद अनुभूति का अहसास करवाता है। ऐसे महान कलाकार को हृदय की अन्नत गहराईयों से षत् षत् नमन।