गहलोत पर किरोड़ी लाल मीणा का वार, ‘पावर’ बयान से राजस्थान में सियासत गरमाई
जयपुर। राजस्थान में लगभग ढाई वर्षों से विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस पार्टी के भीतर मचल रहा अंदरूनी घमासान एक बार फिर खुलकर धरातल पर आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने हाल ही में सचिन पायलट पर सीधे तीखे सवाल दागे थे, अब अचानक इस पूरे विवाद के पटाक्षेप होने का दावा कर रहे हैं। मगर राजनैतिक हलकों में यह यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि क्या यह बयान वाकई आपसी मनमुटाव पर एक पूर्णविराम है, महज कुछ समय का अल्पविराम है या फिर तूफान से पहले की कोई गहरी खामोशी? राजनीतिक विश्लेषक यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या गहलोत के इस डैमेज कंट्रोल वाले रुख के बाद दोनों गुटों की यह तकरार सचमुच थम जाएगी या फिर करौली में पायलट समर्थकों के मंच से जो जवाबी तेवर देखने को मिले थे, वे भविष्य में भी बरकरार रहेंगे।
सचिन पायलट का तंज और अशोक गहलोत की 'भूलो और माफ करो' की नीति
विवाद की शुरुआत तब दोबारा हुई जब रविवार को अशोक गहलोत ने सितंबर 2022 के सियासी घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए मानेसर प्रकरण की यादें ताजा कर दी थीं। इस पर पलटवार करते हुए सचिन पायलट ने बेहद सधे हुए अंदाज में तंज कसा कि उन्होंने सुना है कि गहलोत उन्हें अपने पुत्र वैभव की तरह मानते हैं और वैसा ही लाड-प्यार देते हैं, लिहाजा अब दोनों को साथ आकर 'मोहब्बत की दुकान' खोलनी चाहिए। पायलट की इस प्रतिक्रिया के तुरंत बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने सुर बदलते हुए कहा कि अब सभी पुरानी और कड़वी बातों को पीछे छोड़कर कांग्रेस को एक छत के नीचे एकजुट हो जाना चाहिए। उन्होंने मीडिया के सामने भावुक होते हुए कहा कि चाहे भूल उनसे हुई हो या किसी और से, सबको अपनी कमियां मानकर दल के हित में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि वे पहले ही जैसलमेर में 'भूलो और माफ करो' का संदेश दे चुके हैं।
सियासी गलियारों में उठते सुलगते सवाल और दिल्ली दरबार की चुप्पी पर रहस्य
इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान की राजनीति में कई गंभीर अनुत्तरित सवालों को जन्म दे दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या सूबे की कांग्रेस में कोई भी विवाद पूर्व मुख्यमंत्री की मर्जी से शुरू होगा और उन्हीं के कह देने भर से समाप्त मान लिया जाएगा? इसके अलावा, जब कांग्रेस आलाकमान की मौजूदगी में दिल्ली के भीतर दोनों दिग्गजों की लंबी सुलह बैठक हुई थी, तब संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के दावों के बावजूद दोनों खेमों की तरफ से यह बयानबाजी दोबारा क्यों भड़क उठी? क्या गहलोत के इस ताजा शांति संदेश के बाद जमीनी स्तर पर काम कर रहे दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं की खेमेबाजी सचमुच समाप्त हो पाएगी या यह केवल ऊपरी दिखावा है, इसे लेकर संशय बरकरार है।
वरिष्ठ पत्रकारों का विश्लेषण और कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा का तीखा दावा
मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री के भीतर सत्ता के प्रति गहरा झुकाव है, जिसके चलते वे अपने ही शांति वचनों पर ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाते हैं और वे पायलट को आगे बढ़ते देख पूरी तरह सहज नहीं हैं। दूसरी तरफ, भाजपा सरकार के कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने इस पूरे मामले पर चुटकी लेते हुए एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस का यह युद्ध न तो समाप्त हुआ है और न ही धीमा पड़ा है, बल्कि यह केवल शीर्ष नेतृत्व (आलाकमान) के कड़े डंडे और निर्देश के कारण अख्तियार की गई कुछ समय की मजबूरी भरी खामोशी है। किरोड़ी लाल के मुताबिक, आलाकमान ने दोनों को अभी न लड़ने की हिदायत दी होगी जिसके डर से गहलोत के तेवर बदले हैं, अन्यथा वे किसी भी कीमत पर राजस्थान की सियासत की कमान अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
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