फ्लोर टेस्ट में सियासी रोमांच, किसका पलड़ा भारी?
पटना: बिहार विधानसभा में आज मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार विश्वास मत (शक्ति परीक्षण) का सामना कर रही है। यूँ तो आंकड़ों के लिहाज से एनडीए की राह बेहद आसान नजर आ रही है, लेकिन सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की साख को लेकर हो रही है।
भाजपा नेता मनीष झा के अनुसार, यह फ्लोर टेस्ट सरकार से कहीं ज्यादा तेजस्वी यादव के लिए एक निर्णायक परीक्षा है।
आंकड़ों का गणित: भारी है एनडीए का पलड़ा
243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 122 है। वर्तमान में समीकरण कुछ इस प्रकार हैं:
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एनडीए (सत्ता पक्ष): दावा 201 विधायकों के समर्थन का है।
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महागठबंधन (विपक्ष): कुल विधायकों की संख्या महज 35 है।
तेजस्वी की कुर्सी पर मंडराता 'एक वोट' का संकट
भले ही विपक्ष संख्या बल में बहुत पीछे है, लेकिन तेजस्वी यादव के लिए चुनौती अपनी बची-खुची टीम को एकजुट रखने की है।
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खतरे में नेता प्रतिपक्ष का पद: विधानसभा के नियमों के अनुसार, नेता प्रतिपक्ष बने रहने के लिए कम से कम 25 विधायकों का समर्थन अनिवार्य है। आरजेडी के पास वर्तमान में ठीक 25 विधायक ही हैं।
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टूट का डर: यदि आरजेडी का एक भी विधायक पाला बदलता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो तेजस्वी यादव की नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छिन सकती है।
"खेला होबे" का कड़वा अनुभव
सियासी पंडितों की नजरें तेजस्वी पर इसलिए भी टिकी हैं क्योंकि पिछला इतिहास उनके पक्ष में नहीं रहा है:
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राज्यसभा चुनाव की टीस: हालिया राज्यसभा चुनाव में आरजेडी विधायक फैसल रहमान ने ऐन वक्त पर तेजस्वी का साथ छोड़ दिया था, जिससे पार्टी प्रत्याशी अमरेंद्र सिंह धारी को बड़ा झटका लगा। कांग्रेस के तीन विधायकों ने भी दूरी बना ली थी।
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फरवरी 2024 की यादें: 12 फरवरी 2024 को जब तेजस्वी ने "खेला होबे" का नारा दिया था, तब आरजेडी के ही कई विधायकों ने पाला बदलकर एनडीए का साथ दे दिया था।
सदन के भीतर का माहौल
महागठबंधन की वर्तमान स्थिति पर एक नजर:

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