अमेरिका में 8 महीने बाद ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत कटौती
वॉशिंगटन। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में 0.25 की कटौती की है। इससे ये अब 4.00 से 4.25 प्रतिशत के बीच आ गई है। दिसंबर 2024 के बाद फेड ने दरों को घटाया है। फेड ने यह कदम मुख्य रूप से लेबर मार्केट में नरमी के कारण उठाया है। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने इस कटौती के पक्ष में 11-1 से वोट किया। फेड रिजर्व ने कहा कि हाल के संकेत बताते हैं कि इस साल आर्थिक गतिविधियों की वृद्धि धीमी हुई है। रोजगार के लिए डाउन साइड रिस्क बढ़ गए हैं, जिसके चलते नीति में बदलाव किया गया।
पिछले साल फेड ने लगातार तीन बार- दिसंबर में 0.25 प्रतिशत, नवंबर में 0.50 प्रतिशत और सितंबर में 0.25 प्रतिशत की कटौती की थी। तब से रेट्स 4.25 प्रतिशत से 4.50 प्रतिशत के बीच थे। सितंबर 2024 की कटौती करीब 4 साल बाद की गई थी। फेड ने मार्च 2020 के बाद सितंबर 2024 में इंटरेस्ट रेट्स घटाए थे। महंगाई कंट्रोल करने के लिए सेंट्रल बैंक ने मार्च 2022 से जुलाई 2023 के बीच 11 बार ब्याज दरों में इजाफा किया था। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यह कटौती अमेरिकी शेयर बाजारों के लिए सकारात्मक है, क्योंकि इससे उधार लेना सस्ता हो जाएगा और कंपनियां ज्यादा निवेश कर सकेंगी। भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए भी यह अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी दरों में कमी से विदेशी निवेश बढ़ सकता है।
लेबर मार्केट कमजोर दिखा तो घटाई दरें
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए पिछले कई महीनों से दरों को घटाया नहीं गया था। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जॉब ग्रोथ धीमी पडऩे लगी। अब जब लेबर मार्केट कमजोर दिख रहा है, तो अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए फेड रिजर्व को छूट की जरूरत महसूस हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाल ही में फेड पर दबाव डाला था कि दरों में और ज्यादा कमी की जानी चाहिए ताकि आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले। हालांकि, फेड स्वतंत्र संस्था है और राजनीतिक दबावों से प्रभावित नहीं होती, लेकिन ऐसे बयान बाजार की चिंताओं को बढ़ाते हैं।
महंगाई को काबू करने का मजबूत हथियार है पॉलिसी रेट
सेंट्रल बैंक के पास पॉलिसी रेट नाम का एक मजबूत हथियार है, जिससे वो महंगाई पर लगाम लगा सकता है। जब महंगाई बहुत बढ़ जाती है, तो सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट बढ़ा देता है ताकि बाजार में पैसों का बहाव कम हो जाए। जब पॉलिसी रेट बढ़ता है, तो बैंकों को सेंट्रल बैंक से कर्ज लेना महंगा पड़ता है। नतीजा ये कि बैंक अपने ग्राहकों को भी महंगे लोन देते हैं। इससे बाजार में पैसे कम घूमते हैं, सामान की मांग घटती है और महंगाई नीचे आती है। वहीं, जब अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर में होती है और उसे उबारने की जरूरत पड़ती है, तो सेंट्रल बैंक पॉलिसी रेट कम कर देता है। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वो ग्राहकों को भी सस्ते लोन देते हैं। इस तरह बाजार में पैसे का बहाव बढ़ता है और अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलती है।
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